‘आज’ बस नाम ही काफी है………..

संस्थापक - राष्ट्ररत्न श्री शिवप्रसाद गुप्त

संस्थापना दिवस- ५ सितम्बर, १९२०


‘आज’ के प्रकाशन का उद्देश्‍य


-‘आज’ के संचालकों द्वारा प्रकाशित कर्तव्य सूचना पत्र में लिखा है कि ‘भारत के गौरव की वृद्धि और उसकी राजनीतिक उन्नति ‘आज’ का विशेष लक्ष्य होगा।’


-हमारा उद्देश्य अपने देश के लिए हर प्रकार से स्वतन्त्रता पाना है। हम अपने देशवासियों में स्वाभिमान का संचार करना चाहते हैं। उनको ऐसा बनायें कि भारतीय होने का उन्हें अभिमान हो, संकोच नहीं। जब हममें आत्मगौरव होगा तो अन्य लोग भी हमें आदर और सम्मान की दृष्टि से देखेंगे। जब हमारे घर ऊंचे होंगे तो बाहर के लोग हमारा निरादर करने का साहस नहीं करेंगे।


-हमारा मूल मन्त्र है कि हमारे देश का गौरव बढ़े। यही हमारा राष्ट्रीय सिद्धान्त है और यही हमारा राजनीतिक सिद्धान्त है।


-‘आज’ देश में जातीय संघर्ष, दंगा-फसाद नहीं चाहता और न ही व्यक्ति-व्यक्ति में वैमनस्य पसन्द करता है। हम उन सभी बातों के पक्षधर हैं जिनसे भारत और भारतीयता का नाम विश्वमें रोशन हो। हमारा प्रयास यही रहता है कि व्यक्ति विशेष पर कटाक्ष न हो। उनके विचारोंकी समीक्षा और परीक्षा की जा सकतीहै। चरित्र-हनन से हमें परहेज है और न ही हम किसी की व्यक्तिगत जिन्दगी में ताक-झांक को पसन्द करते हैं।


-हमारा लक्ष्य अपना घर सम्भालने का है, दूसरों के घर ढहाने का नहीं। हां, अपना घर ठीक करने में यदि कोई किसी तरह की बाधा उपस्थित करता है तो हम उसका प्रतिकार अवश्यकरेंगे।


-हम मानते हैं कि राष्ट्र का एकमात्र अंग राजनीति नहीं है। वह साधन है, साध्य नहीं, वह माध्यम है, लक्ष्य नहीं।


-हम देश काल के अनुरूप शिक्षा के हिमायती हैं और इसके लिए हम निरन्तर संघर्षशील रहते हैं। हम चाहते हैं कि देश में ऐसी सर्वव्यापी शिक्षा की व्यवस्था हो जिससे लोग अपने अधिकार और कर्तव्य समझ सकें। हमारा उद्देश्य है कि शिक्षा ऐसी दी जाय जिससे शिक्षितों को रोजगार मिले।


-व्यापार, व्यवसाय, कृषि आदि की उन्नति पर ‘आज’ हमेशा जोर देता रहा है, आज भी वह उसीनीति पर चल रहा है और आगे भी चलता रहेगा। हम मानते हैं कि धन और सम्पत्ति के बिना हमारा राष्ट्रीय जीवन निष्फल है। हमें हर नागरिक को पर्याप्त धन-धान्य, सुख-सुविधा मिले, यह भी देखना है।


-‘आज’ धार्मिक और सामाजिक स्वतन्त्रता का पक्षधर है। हम चाहते हैं कि सभी धर्मों के लोग परस्पर मिलजुल कर स्नेह से रहें। हर आदमी यह समझे कि स्वराष्ट्र की उन्नति ही उसका सर्वश्रेष्ठ धर्म है। राष्ट्रभक्ति से ऊपर कोई धर्म नहीं।


-लेखन-शैली, विचार गाम्भीर्य और शिष्ट भाषा की प्रणाली की रक्षा करते हुए सभी प्रकार के नये-पुराने मतों को ‘आज’ में स्थान दिया जाता है। हम इस बात की बराबर कोशिश करते हैं कि मतों के प्रकाशन में राग-द्वेष, दलबन्दी, तटबन्दी आदि न आने पाये।


-हम यह मानते हैं कि एक जाति या देश को दूसरी जाति या देश पर अनुचित आक्रमण नहीं करना चाहिए। हर देश अन्य देशों के आक्रमण से संरक्षित रहे और अपने घर का प्रबन्ध करने में उसे पूरी आजादी प्राप्त हो। बाहर की दखलन्दाजी हमें बर्दाश्त नहीं।


-हमारी संस्कृति, सभ्यता और परम्परा सबसे पहले है। इनकी रक्षा के लिए ‘आज’ कुछ भी कर सकता है।


‘आज’ का नाम ‘आज’ ही क्यों

‘आज’ के नामकरण के बारे में कहा गया- हमारा पत्र दैनिक है। प्रत्येक दिन इसका प्रकाशन होगा। संसार भर केनये-नये समाचार इसमें रहेंगे। दिन-प्रतिदिन संसार की बदलती हुई दशा में नये-नये विचार उपस्थित करने की आवश्यकता होगी। हम इस बात का साहस नहीं कर सकते कि हम सर्वकाल, सर्वदेश, सर्वावस्था के लिए जो उचित, युक्त और सत्य होगा, वही सर्वदा कहेंगे। हमें रोज-रोज अपना मत तत्काल स्थिर करके बड़ी-छोटी सब प्रकार की समस्याओं को समयानुसार हल करना होगा। जिस क्षण जैसी आवश्यकता पड़ेगी, उसी की पूर्ति का उपाय सोचना और प्रचार करना होगा। अतएव हम एक ही रोज की जिम्मेदारी प्रत्येक अंक मेंले सकते हैं। वह जिम्मेदारी प्रत्येक अंक में ले सकते हैं। वह जिम्मेदारी प्रत्येक दिन केवल आज की होगी, इस कारण इस पत्र का नाम ‘आज’ है।


ऐसे हुआ आज का उदय


राष्ट्ररत्न श्री शिवप्रसाद गुप्त ने ३० अप्रैल, १९१४ से शुरू हुई अपनी विदेश यात्रा के दौरान तीन महत्वपूर्ण अनुभव एकत्र किये-


(१) जहां-जहां वह गये, उन्होंने देखा कि वहां के लोग अपनी मातृभाषा अथवा अपने देश की भाषा में ही बात करते हैं और गर्व का अनुभव करते हैं। इससे प्रभावित होकर उन्होंने निश्चय किया कि अब वह भी बोलचाल, भाषण, पत्र-व्यवहार आदि में हिन्दी का ही प्रयोग करेंगे और उसके विकास एवं समुन्नयन के लिए हर सम्भव प्रयास करेंगे। इस संकल्प का उन्होंने जीवनभर पालन किया। ‘आज’ के जन्मके पीछे यह भी एक कारक रहा।


(२) जापान की एक शिक्षा संस्था का निरीक्षण कर वह विशेष रूप से प्रभावित हुए। यह संस्था सरकारी सहायता और सरकारी प्रभाव से एकदम मुक्त थी। उन्होंने निश्चय किया कि भारत में भी राष्ट्रीय शिक्षाप्रदान करने के लिए ऐसी ही एक संस्था स्थापित की जाय जो सरकारी नियन्त्रण से मुक्त हो। काशी विद्यापीठ की स्थापनाके पीछे यही लक्ष्य था।


(३) ब्रिटेन में ‘लन्दन टाइम्स’ समाचार-पत्र से श्री गुप्त बहुत प्रभावित हुए। उनके मन में एक सपने ने जन्म लिया कि राष्ट्रभाषा हिन्दी में भी ऐसा ही एक प्रभावशाली समाचार-पत्र प्रकाशित किया जाना चाहिए। यह सपना ‘आज’ के जन्म के रूप में साकार हुआ।


नीतियां और उद्देश्य


राष्ट्ररत्न ने ‘आज’ के प्रकाशन के सम्बन्ध में जब लोकमान्य तिलक का परामर्श प्राप्त करने की चेष्टा की तो तिलक महाराज ने इन बातों पर विशेष बल दिया-


-स्वराज्य प्राप्त करने का प्रयत्न करो।


-अपने पत्र के माध्यम से लोगों को उनके स्वाभाविक अधिकार समझा दो।


-अपने धर्म के पालनमें यदि विघ्र उपस्थित हो तो उसकी परवाह न करो और ईश्वर के न्याय पर विश्वास रखो। ‘आज’ का प्रकाशनारम्भ होने पर इन उपदेशात्मक बातों का पालन करना ही अखबार का उद्देश्य माना गया।


‘आज’ की मूल नीति की घोषणा करते हुए संस्थापक राष्ट्ररत्न श्री शिवप्रसाद गुप्त और सम्पदक पण्डित बाबूराव विष्णु पराडक़र ने कहा - हमारा उद्देश्य अपने देश के लिए पूर्ण रूप से स्वतन्त्रता का उपार्जन करना होगा। हम हर बात में स्वतन्त्र होना चाहते हैं और यही हमारा लक्ष्य है।


‘आज’ का विस्तारीकरण


‘आज’ के विस्तारीकरण की प्रक्रिया १९७७ से शुरू हुई। कानपुर से ‘आज’ का प्रकाशन शुरू हुआ। इसके बाद उत्तर प्रदेश में आगरा, गोरखपुर, इलाहाबाद, लखनऊ, बरेली से भी ‘आज’ प्रकाशित होने लगा। बिहार में पटना, रांची, धनबाद, जमशेदपुर से ‘आज’ का प्रकाशन होता है। ‘आज’ के सभी संस्करण कम्प्यूटर, फैक्स, मोडम, इण्टरनेट और अति आधुनिक छपाई मशीनों से लैस हैं। सूचना एवं प्रौद्योगि की के क्षेत्र में जो क्रान्ति आयी है, उससे कदम से कदम मिलाकर ‘आज’ आगे बढ़ रहा है। इसकी प्रसार संख्या निरन्तर बढ़ रही है। सभी संस्करणों में साप्ताहिक विशेषांक नियमित रूप से और विभिन्न विषयों पर परिशिष्ट समय-समय पर प्रकाशित होते रहते हैं। ‘आज’ ने हमेशा जनता की आवाज बुलन्द की है। आजादी से पहले भी और आजादी के बाद भी। अवरोधों के बावजूद वह कभी अपने कर्तव्य से विमुख नहीं हुआ। ‘आज’ आज भी भारतीय जनता की आवाज है।


सन् १९२० में ही यानी आज से ९४ साल पहले ‘आज’ ने अपने एक सम्पादकीय में जो लिखा था, वह आज भी एकदम सत्य है। यह ‘आज’ की परम्परागत दूरदृष्टि का प्रतीक है। सम्पादकीय इस प्रकार है- ‘संसार इस समय बेचैन है। चारों ओर हलचल है। सब नर-नारीपरेशान हैं। क्यों? राष्ट्रनीतिज्ञों को इसका कारण विचार कर निकालना चाहिए। जिधर देखिये उसी ओर अशान्ति विराज रही है। सब लोग एक दूसरे से अप्रसन्न हैं। अपनी-अपनी श्रेणी को संघटित कर सब लोग दूसरी श्रेणियों से लडऩे के लिए तैयार हैं। इस हलचल में केवल एक सिद्धान्त है- जिसके पास अधिकार है, उससे अधिकार ले लेना चाहिए। जिसके पास अधिकार नहीं है, वह दूसरों को अधिकार प्राप्त देखकर जलता है और उसके पास से अधिकार हटवाना चाहता है। अनाधिकारी अधिकारी से द्वेष करता है और अधिकारी अनाधिकारियों की संख्या देख उनसे डरता है, उनकी संघटित शक्ति घटाना चाहता है और उनके प्रति रोष दिखाकर उन्हें अधीन अवस्था में ही पड़े रहने का आदेश देता है। राष्ट्र-राष्ट्र, वर्ग-वर्ग, वर्ण-वर्ण सबके झगड़े का मूल मन्त्र यही प्रतीत होता है कि अधिकारी के पास अधिकार न हो।


अधिकार हटाया जाना चाहिए। तो शान्ति कैसे हो सकती है, चैन कैसे मिल सकता है? शासन और शासित, मालिक और मजदूर, अमीर और गरीब अपने-अपने हक और फर्ज दोनों को जब तक अच्छी तरह नहीं समझते, तब तक नीति नहीं हो सकती। दो परस्पर विरोधी श्रेणियों को यह सच समझना होगा।’


श्री सत्येन्द्र कुमार गुप्त


परम देशभक्त और विद्या अनुरागी श्री सत्येन्द्र कुमारगुप्त ने सन् १९५९ में ‘आज’ के प्रधान सम्पादक का गुरु गम्भीर दायित्व ग्रहण किया। उनकी विवेक दृष्टि, दृढ़ संकल्प और उनके नैष्ठिक व्रत ने पत्र को नयी ऊंचाई दी। आपका त्यागमय और आदर्शवादी जीवन था। इससे पहले १९४२ से सोलह वर्ष तक उन्होंने ‘आज’ का कौशलपूर्वक संचालन किया था। उन्होंने जब प्रधान सम्पादक का कार्य सम्भाला था, उथल-पुथल और संकटों का समय था। हिन्दी समाचार-पत्र भी उससे अछूते नहीं थे। मिशन की भावना का लोप हो चुका था। व्यावसायिक मानसिकता और व्यावसायिक वास्तविकता ने पत्रों का स्वरूप औरउद्देश्य ही बदल दिया था। उद्योग, व्यापार और राजनीति का नया अर्थ नवीन शक्ति के रूप में समाजको प्रभावित कर रहा था। महंगी और अभाव जन-जीवन को सन्त्रस्त कर रहा था। अखबारी कागज औरअन्य संसाधन भी सहज उपलब्ध नहीं हो रहे थे। ऐसी विषम परिस्थिति में भी सत्येन्द्रकुमार गुप्त ने ‘आज’ की गौरवपूर्ण परम्परा की रक्षा करते हुए पत्र को उन्नति की ओर अग्रसर किया।


श्री गुप्त ने अनेक बाधाओं के बावजूद पत्र का पृष्ठ-विस्तार कर उसे नये भारत की आवश्यकता के अनुरूप बनाया। पत्र में केवल राजनीतिक समाचार ही नहीं, सांस्कृतिक, साहित्यिक और लोकमंगल से जुड़ी खबरों को भी अधिक स्थान और महत्व प्राप्त होने लगा। आपने विभिन्न समाज में राष्ट्र-निर्माण के प्रति जागृति पैदा करने के लिए पत्र के माध्यम से प्रेरित किया। भारत की आत्मागांवों में बसती है। पराधीन काल में इनकी जिस तरह उपेक्षा की गयी, उससे न केवल आत्मनिर्भरता समाप्त हो गयी अपितु उसका सांस्कृतिक वैशिष्ट्य भी नष्टहो गया। आपनेलुप्त होती लोककला और लोक संस्कृति को नया जीवन देने के लिए पत्र के माध्यम से यथेष्ट प्रोत्साहन दिया।‘आज’ पहला पत्र है जिसने सबसे अधिक महत्व गांवों को दिया। विश्वसनीयता पत्र की सफलता की कुंजी है। यही समाचार पत्र की सार्थकता को सिद्ध करती है। वह इसके लिए सदैव सतर्क रहते थे। श्री गुप्त पत्रकारिता के उन गुणों तथा परम्पराओं के प्रबल समर्थक थे जिसको राष्ट्ररत्न श्री शिवप्रसाद गुप्त ने प्रस्थापित किया था और जिनके द्वारा यह क्षेत्र सम्मानित और गौरवान्वित होता है। श्री गुप्त मानते थे कि लिखे हुए शब्द सत्यनिष्ठ होने चाहिए। उनकोस्पष्ट निर्देश था कि सत्य का निरूपण करना कर्तव्य है, पर उसकी अभिव्यक्ति की भी मर्यादा है। पचीस वर्षों तक ‘आज’ के सफल सम्पादन के बाद उनका निधन ६ नवम्बर, १९८४ को हो गया।


श्रीमती शशिबाला गुप्त


‘आज’ की विकासयात्रा में ज्ञानमण्डल की अध्यक्षा श्रीमती शशिबाला गुप्त का भी महत्वपूर्ण योगदानरहा है। सन्ï १९४२ में जब श्रीसत्येन्द्र कुमार गुप्त ने ज्ञानमण्डल लिमिटेड का प्रबन्ध सम्भाला, उनकी सहधर्मिणी श्रीमती शशिबाला गुप्त इस कार्य में सक्रिय सहयोग प्रदान करती थीं। उन्होंने १९५९ में ज्ञानमण्डल के प्रबन्ध संचालक का कार्यभार सम्भाला और जीवन पर्यन्त बखूबी निभाया। वह केवल निपुण गृहिणी ही नहीं, अपितु कुशल प्रशासक भी थीं। उन्होंने ज्ञानमण्डल मुद्रणालय के पुराने यन्त्रों के स्थान पर तेजी के साथ मुद्रण के लिए आधुनिकतम यन्त्र स्थापित किये। उनका सिद्धान्त था कि हर चीज के लिए एक स्थान होना चाहिए और हर चीज अपने स्थानपर होनी चाहिए। प्रबन्धनका यह गुर उनकी सफलताका रहस्य था। हर हाल में व्यवस्था बनी रहनी चाहिए और उसमें तनिक भी व्यवधान उन्हें पसन्द नहीं था। समय से अखबार पाठकों के हाथों में पहुंच जाय, इसका वह पूरा ध्यान रखती थीं। पत्र छपाई ऐसी हो जिससे वह सर्वांग सुन्दर हो, इसके लिए शशिबाला जी विशेष रूपसे सतर्क रहती थीं और अपने सहयोगियों को निर्देश देती थीं। ‘आज’ की स्वर्ण जयन्ती के अवसर पर उनके प्रोत्साहन और प्रेरणा से सचित्र ‘प्रेमसागर’ का प्रकाशन हुआऔर उसे नि:शुल्क वितरित किया गया। यह उनके प्रयासका फल था कि मुद्रणके क्षेत्र में ज्ञानमण्डल देशमें अग्रणी मुद्रणालय बन गया।


श्री शार्दूल विक्रम गुप्त


वर्तमान में श्री शार्दूल विक्रम गुप्त ‘आज’ के प्रधान सम्पादक हैं। उनके कुशल नेतृत्व और निर्देशन में यह पत्र निरन्तर उन्नति के पथ पर अग्रसर है। उन्होंने सन्ï १९८४ में प्रधान सम्पादकका कार्यभार सम्भाला। वैसे, सन्ï १९७९ से ही वहपत्रकारिताके क्षेत्रमें हैं जब उनके नेतृत्वमें अत्यन्त लोकप्रिय पत्रिका ‘अवकाश’ का प्रकाशन आरम्भहुआ। इस पत्रिकाने अल्पकालमें ही हिन्दी जगतमें अपना महत्वपूर्ण स्थान बना लियाथा। उन्होंने ‘आज’ के सम्पादककाकार्यभार सम्भालते ही पूरे मनोयोग और अपार उत्साह से पत्र के विस्तार की योजना बनायी और उसे मूर्तिमान करने के लिए अथक प्रयास किया। यह उनकी दूरदर्शिता ओर शिव संकल्प का परिणाम है कि आज यह पत्र देश के विभिन्न राज्यों के पन्द्रह नगरों से एक साथ प्रकाशित हो रहा है और इसकी प्रसार संख्या लाखों में पहुंच गयी है। आज पत्रकारिता पेशा बनगयी है। व्यावसायिक स्पर्धाने पत्रोंको आकर्षक अवश्य बनाया है लेकिन निरन्तर महंगे हो रहे पत्र आम आदमी की पहुंचसे बाहर होते जा रहे हैं। इसके विपरीत श्री गुप्त ने ‘आज’ को सर्वसुलभबनाये रखा है। वस्तुत: वह उन आदर्शों और सिद्धान्तोंके लिए प्रतिबद्ध हैं जिनकोलेकर राष्टï्ररत्नशिवप्रसादजीने ‘आज’ की स्थापना कीथी। श्री गुप्तने पत्रको जनसेवाका माध्यम बनाये रखा है। उनके नेतृत्व, उदार प्रोत्साहन, उदात्त प्रेरणाऔर सक्रिय सहयोगसे ‘आज’ निरन्तर आगे बढ़ रहा है।


‘आज’ का वर्तमान


‘आज’ हर मोर्चेपर आज भी ईमानदार लड़ाई लड़ रहा है। उसकी नजर आज भी शासक पर है, शासित पर है। अफसरशाही की गतिविधियों पर उसकी कड़ी नजर होती है। ग्राम जगत उससे अछूता नहीं है। गांवों की समस्याओं को वह सर्वोच्च प्राथमिकता देता है। शिक्षा, शिक्षक, शिक्षार्थी, महिलाओंकी स्थिति, बढ़ते अपराध, सरकारकी दुर्नीति, पुलिसकीनिष्क्रियता सबपर उसकी नजर होती है। मजदूर और कानून, हड़ताल और बन्द सभी उसके दायरे में हैं। राजनीतिक दल और धार्मिक प्रश्न जैसे विषयों पर ‘आज’ के विचार स्वतन्त्रत होते हैं। श्रमजीवी युग की बारीकियों को वह पहचानता है। भविष्यपर ‘आज’ की नजर बराबररहती है। अहिंसापर हम पहले भी जोर देते रहे और आज भी देते हैं। राष्ट्र की आर्थिक समृद्धि के बारेमें ‘आज’ की चिन्ता सर्वोपरि है और जनताके सुख-दु:खका साथी बनेरहनेमें ‘आज’ को गर्वका अनुभव होता है। हम आप बीती को विशेष महत्व देते हैं। आपबीती वह है जो हमारे देशकी जनता पर बीतती है। प्रकाश में अन्धकार ढूंढऩे की ‘आज’ की आदत नहीं है, फिर भी वह सचेष्ट रहता है कि सर्वत्र प्रकाश ही प्रकाश हो। अन्धेरा मिट जाय। जनता क्या चाहती है इसे शासकोंतकपहुंचाना हमारा फर्ज है। हम जनसेवाके व्रती हैं। ‘आज’ के लिए भारतवासी ही नहीं, सम्पूर्ण मानवमात्र ईश्वर समान है। हम मानते हैं कि मानव सेवा ही सच्ची ईश्वर सेवा है। इसी रास्तेपर ‘आज’ आज भी चल रहा है।


ज्ञानमण्डल (प्रकाशन संस्थान)


राष्ट्ररत्न श्री शिवप्रसाद गुप्त के हृदय में हिन्दी के प्रति असीम अनुराग था। उनकी आकांक्षा थी कि विश्व का समस्त ज्ञान हिन्दीमें भी प्रस्तुत किया जायऔर हिन्दी साहित्यकी उन्नतिमें समुचित योगदान करनेके उद्देश्यसे ऐसी संस्था स्थापित की जाय जो एकमात्र इसी उद्देश्यको लेकर प्रकाशन-कार्य आरम्भ करे। अपनी इसआकांक्षा को मूर्तिमान करनेके लिए उन्होंने सन्ï १९१६ में ज्ञानमण्डल नामक प्रकाशन संस्था की स्थापना की और इस कार्यके लिए ज्ञानमण्डलके हीनामसे एक बड़ा मुद्रणालय भी स्थापित किया। प्रकाशन विभागमें सबसे पहले हिन्दी के प्रख्यात विद्वान पद्म सिंह शर्माको नियुक्त किया गया जिन्होंने ‘बिहारी सतसई पर सतसई संहार’ नामक समीक्षा ग्रंथ की रचना की। इसके बाद इस विभागका कार्यभार रामदास गौड़ को सौंपा गया। बाद में मुकुन्दीलाल श्रीवास्तव ने इस विभाग का दायित्व ग्रहण किया। डाक्टर सम्पूर्णानन्द, मुंशीप्रेमचन्द्र आदिका भी सहयोग लिया गया। जनवरी १९५४ में देवनारायण द्विवेदीआमन्त्रित किये गये। इस प्रकार ज्ञानमण्डलमें उच्च स्तरके हिन्दी ग्रंथों के प्रकाशन की शुरुआत हुई।